संसार में छल और कपट से बड़े भाइयो का हक खाते आये है छोटे भाई
हाँ जी सुनने में थोड़ा अटपटा परंतु परम सत्य , सीधे और सच्चे बने रहना जीवन को नरक बनाने के समान है पिछले कुछ दिनों आत्हत्या की घटनाये सामने आई है जिसमे बड़े भाई जो कि जिम्मेदारी समझ लगातार पूरे परिवार को साथ लेकर आगे बढ़ते रहे अपनी अधेड़ उम्र पर आ कर जिस परिवार के लिए उन्होंने अपना जीवन लगाया वही परिवार और उनके खास छोटे भाई द्वारा पूरे परिवार को गुमराह कर अपना वर्चस्व स्थापित करने मात्र की लालसा में बड़े भाई के प्रति भड़काने और नीचा दिखाने के लिए हर नीच हरकत पर उतर आए यहां तक बड़े भाइयो को इतना अपमानित और कमजोर कर दिया गया कि वे आत्महत्या पर विवश हो गए । 1 वर्ष पूर्व वृन्दावन मथुरा में राजू भारती जो प्रमुख उद्योग पति एवम नेता भी थे बेहद मिलन सार और सामाजिक व्यक्ति रहे उन्होंने छोटे भाई एवम परिवार से तंग आकर आत्महत्या करली । पूरा मथुरा जनपद एवम उन्हें जानने वाले इस घटना से स्तब्ध रह गए । उनके भाई के द्वारा उनका अपमान किया गया जो कि उनको आत्महत्या करने पर मजबूर करने की ओर इशारा करता है । तमाम मीडिया के साथियो ने आवाज उठानी चाही परंतु उन्हें न्याय नही मिल सका । आदमी के मरने के बाद कैसा न्याय जब व्यक्ति जिंदा होता है तब तो न्याय मिल नही पाता मरणोपरांत को न न्याय देगा ?
इसी प्रकार की घटना पानीपत में हाल ही में सामने आई है जहां छोटे भाई ने अपनी चतुराई से माता को अपने पक्ष में कर बड़े भाई को घर से निकलवाया और उसे जायदाद से बेदखल करने की साजिश रची यह षड्यंत्र वर्षो से चलता रहा अंत मे बड़ा भाई हार गया और उसने अपने 5 वर्षीय पुत्र 9 वर्षीय पुत्री एवम अपनी पत्नी को लायसेंसी रिवाल्वर से गोली मार दी इसके बाद स्वयम को गोली मारकर जीवन लीला समाप्त कर ली । पत्नी के घर वालो ने इस पूरी घटना पर से पर्दा हटाया । परंतु न्याय मिलना मुश्किल नजर आ रहा है ।
इस प्रकार के प्रकरणों को देख कर लगता है इन हत्याओं के दोषी वे माता पिता होते है जो स्वयम निर्णय नही ले पाते चमचागिरी और चाटुकारिता घर मे भी हावी हो जाती है । जो बेटा कुछ कार्य और सेवा ना कर झूठा दिखावा करता है सिर्फ और सिर्फ खुद को स्थापित करने के उद्देश्य से बड़े बेटे का वैभव यश कीर्ति से जलन के कारण उसे नीचा गिराने उसे कमजोर करने की पुरजोर कोशिश करता है माता पिता उसकी कठपुतली बन जाते है । इसमें बहुत बड़ा रोल घर की बेटियों का होता है जो छोटे भाई को अपना प्यारा भाई समझ कर बड़े भाई ले सारे कार्यो को भूल उसे स्थापित करने में लग जाती है ।
इन हत्याओं के पीछे बड़े भाइयो को नीचा दिखाने कमजोर करने में सहयोग करने वाले रिस्तेदार सगे संबंधी सभी जिम्मेदार होते है। ऐसे लोगो के विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज कर कार्यवाही होनी चाहिए।
ये लोग मानवता के नाम पर धब्बा होते है क्योंकि यह लोग परिवार के परिवार को नष्ट करने में उनके हस्ती खेलती जिंदगी को नरक बनाने में बेहद खुशी महसूस करते है अपनी जिंदगी खुशहाली से जीते है । दूसरे कमजोर पड़ रहे घर के सदस्य को नीचा दिखाने एवम उसे और ज्यादाकामजोर करने में आत्म संतुष्टि प्राप्त करते है यही उनका स्वप्न होता है। यह लोग ऐसा व्यवहार करते है जैसे कोई प्रतिशोध ले रहे हो।
जब कि सत्यता यह होती है यह वे लोग होते है जो किसी के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ नही बोल पाते कभी किसीकी मदद नही कर सकते । अपनी ही मदद नही कर सकते। डरपोक होते है । अपने आपको बेहद चतुर कहते है और अपने नजदीकी को सामने मीठा बोल उसकी पीठ में छुरा घोंपने की योजना बनाते है।
शायद आप लोगो यह बात अच्छी नही लग रही होंगी परंतु यह सत्य है अकाट्य सत्य । सामने शराफत का मुखोटा पहने यह लोग नाग नागिन से कम नही होते जो भूख लगने पर अपने ही बच्चों को खा जाते है।
जी हाँ ऐसी ही कहानी एक समाजसेवी महत्वाकांशी युवा की है जिसने एक गरीब परिवार में जन्म लिया। पढ़े लिखे माता पिता परंतु गरीब किसान । पिता के भाई पढ़ लिख कर सरकारी सेवाओं में संलग्न हो अच्छा जीवन यापन करने लगे ।
इस परिवार का बड़ा पुत्र जिसका जन्म 1981 में हुआ 5 वर्ष की आयु में अपने बड़े ताऊ के पास पड़ने भेजा गया । वहां जाकर जैसे रहा वैसे रहा बचपन में ही वापस आया कक्षा 6 से ही कुछ समझदारी आने पर अपने गरीब माता पिता को गरीबी से चटकारा दिला अपनी बहनों कोअच्छी शिक्षा अच्छी शादी कर अच्छे परिवार में भेजने के लिए सोचने लगा । कक्षा 12 तक पहुंचते पहुंचते खेती बाड़ी ट्रेक्टर चलना काम करके अपने पिता का सहयोग करने में लग गया । वर्ष 1999 में स्नातक में आते आते देश समाज के संबंध में सोचते हुए उसने अपने गांव के विकास की योजना बनाई बड़े ताऊजी से सहयोग लेकर संघर्ष कर पैदल घूम घूम कर एक संस्था बनाई। वर्ष 2000 में गांव के विकास के लिए कक्षा 1 से 5 एवम 9से 10 तक विद्यालयो की स्थापना की बेहद तल्लीनता के साथ शिक्षा प्रदान की , अपनी शिक्षा के साथ साथ ही संस्था के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । स्नातक करने के पश्चात परास्नातक किया जिसके करते ही देश मे व्याप्त अन्याय अत्याचार भर्ष्टाचार के विरुद्ध अभियान शुरू किया युवाओ को जागरूक भी करने लगा। जAगरुक युवा संगठन भारत की स्थापना की। युवाओ से नाशे से दूर रहने का आह्वाहन एवम खाली समय का उपयोग अच्छे कार्यो में करने का संदेश देने लगा । सामाजिक कार्यो के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों में भी संगन रहा उसके 3 बहने जो कि छोटी थी भाई 11 साल छोटा जिन्हें वह सारी सुविधाएं मुहैया कराने में लगा रहा । विद्यालय भी गांव के अनेक छात्रों का भविष्य निर्माता बना। वर्ष 2006 में विद्यालय को कक्षा 11 12 के संचालन की अनुमति मिली । साथ ही दिन रात की मेहनत से माता पिता की गरीबी भी चली गयी उल्टा वह समृद्ध हुए । बड़े बेटे के हर निर्णय मे साथ भी रहे ।अब भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी लड़ाई लड़नी थी उसने अब वर्तमान व्यवस्था पर सवाल उठाने शुरू किए । लोगो को न्याय दिलाने शुरू किया जिससे उसकी ख्याति बढ़ने लगी । परंतु यह क्या ज्यो ज्यो छोटा बेटा बड़ा हुआ । माता पिता और बड़े बेटे के बीच खाई पैदा होना शुरू हो गया । बड़ा भाई जुटा रहा इन सब चीजों से अन्विज्ञ बेखबर बहनो की शादियां धूमधाम से की,
जिसकी कल्पना माता पिता ने सपनो में भी ना की हो ऐसी शादियां हुई । शिक्षा के लिए छोटे भाई को कही बाहर नही भटकना पड़ा कम्प्यूटर से लेकर खेलने के हर सामान सब भाई को उपलब्ध कराए । 12 वी के उपरांत ही छोटे भाई को सिविल सर्विस की परीक्षा पास करने के लिए प्रेरित किया ।परंतु मूर्ख को क्या पता था कि यही भाई उसके लिए सबसे बड़ा दुश्मन बनकर उभरने वाला है ।
यही छोटा भाई और बहने लगातार एक षड्यंत्र रचती रही पीठ पीछे भाई के बाद रहे सामाजिक दायरे से जलन । प्रसिद्धि से जलन और द्वेष एवम छोटे भाई को स्थापित करने की योजना बनाने लगी । माता पिता के अंदर बड़े भाई के प्रति नफरत भरनेका कार्य लगातार जारी रहा ।
2008 में बड़े भाई की शादी हुई । जिसके बाद घर मे और अधिक विवाद गहराने लगे ।
वर्ष 2009 बड़े भाई को घर से रहने पर विवश कर दिया गया ।
2009 में बड़े भाई को माता पिता से नफरत भारी उल्टी सीधी बाते कहलवाया गया । वह घर से जाने पर विवश हो गया वह भी खाली हाथ । घर से कोई सहयोग नही मिहला । 2009 में सहयोग धर्मार्थ चिकित्सालय की स्थापना की। मोतियाबिंद के निशुल्क ऑपरेशन कराये। एक सरकारी प्रोजेक्ट के तहत कार्य किया ।
2 वर्ष बाद माता पिता द्वारा पुनः इमोशनल ड्रामा कर पुनः वापस बुलाया गया।
वर्ष 2011 में विद्यालय की स्थिति नाजुक थी जिसे सम्भालने के लिए विद्यालय को आधुनिकीकरण किया । फर्नीचर , विद्युतीकरण , सीसीटीवी कैमरे , झूले आदि से विद्यालय सुसज्जित किया। इस सबके लिए धन का कोई सहयोग माता पिता के द्वारा नही मिला । बड़े बेटे ने स्वयम इसकी व्यवस्था कर यहसारे कार्य कराए । गांव गांव संपर्क किया । जिससे अच्छे परिणाम मिले। साथ ही डिस्टेंस एजुकेशन के डिग्री डिप्लोमा कोर्सेज भी शुरू कराये गए ।
जैसे ही परिणाम मिलना शुरू हुए पिता जी विद्यालय के कॅश काउंटर पर आसीन हो गए । पिता के से एक दो बार आग्रह करने पर कि विद्यालय में बहुत पैसे लगे है हमे सुचारू रूप से संचालन करने दीजिए । पिता नही माने । बड़ा पुत्र पुनः वापस नाराज़ हो चला गया। अपने धर्मार्थ चिकित्सालय एवम संस्थाओ को संचालित करने लगा।
अब किसीने कभी उसकी कुशल क्षेम नही पूछी एवम किसी परेशानी में साथ नही आये । कोई खबर नही ली
3 वर्ष बाद जब विद्यालय पूण खत्म होने के कगार पर आया तब पुनः फिर से विद्यालय की जिम्मेदारी दे दी गयी।
वर्ष2014 इस बार माता जी को आगे किया गया आने वाली फीस के लिए माता जी जाती और ले आती ।
इस सब के बीच यह महत्व पूर्ण है कि खेती का सम्पूर्ण पैसा अन्य साधनों से होने वाली आय सदैव माता पिता के ही हाथ मे रही एक एक पैसे का हिसाब रहा और सदैव बड़े बेटे पर अनर्गल आरोप इनलोगो द्वारा लगाए जाते रहे।
इनलोगो से षड्यंत्र के तहत पुनः बेटे को विद्यालय छोड़ने पर मजबूर कर दिया । वर्ष भर लगाई गयी लागत भी बेकार गयी जो कि अपनी जेब से लगानी होती है। सत्र के अंत मे गरीब छात्रों द्वारा दी जाती है जिसे पुनः माता पिता द्वारा रख लिया गया। अभी तक भी बड़ा बेटा परिवार को परिवार ही समझता रहा और चल रहे गहरे षड्यंत्र को समझ नही पाया । इसके बाद भी कभी कोई सहायता नही की गई ।
वर्ष 2017 जब विद्यालय पुनः खत्म होने की कगार पर आ गया छात्र संख्या नगण्य रह गयी भवन खाली रह गया भवन को देख बेहद दुख हुआ आर्थिक स्थिति से टूटा हुआ बड़ा पुत्र वहां सरकारी योजनाए लेकर आया पुनः उसमे प्राण फूंकने के प्रयास किये प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अंतर्गत प्रशिक्षण प्रारम्भ किया गया । जो कि सफल रहा ।
विद्यालय संचालन का उद्देश्य छोड़कर सिर्फ सामाजिक संस्थाओं के संचालन का मन बना चुके बेटे को पुनः इमोशनली मूर्ख बनाने पिता ने फिर चाल चली। प्यार से कहा कि विद्यालय संचालन करो। बार बार कहने पर बेटे का स्वप्न्न विद्यालय महाविद्यालय संचालन के क्षेत्र में बालक बालिकाओ का उत्थान था ही उसे द्रवित कर दिया और पिता द्वारा 5 लाख की सहायता की शर्त पर पुनः विद्यालय संचालन के प्रयास तेज कर दिए।
विद्यालय को पुनः जीवन्त करने के लिए स्वयम व उसकी पत्नी एवम नया स्टाफ दिन रात कड़कती धूप में संपर्क में रहे और विद्यालय जीवंत कर दिया ।
विद्यालय जीवन्त होते ही धन की आवश्यकता पड़ने पर पुनः हाथ खड़े कर दिए गए क्योंकि इस बीच छोटे बेटे ने जिसे की आईपीएस की पढ़ाई हेतु बड़े भाई ने ही दिल्ली भेजा हुआ था डेरे गांव में डाले हुए थे । सिर्फ इस बात के लिए की भाई को पैसा ना दिया जाए।
बड़ा भाई अब भी नासमझ था क्योंकि वो अब भी अपना परिवार ही समझता था ।
इसके बाद पुनः बड़े भाई को घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा ।
गांव छोड़ते ही छोटे बेटे को बुला विद्यालय का कार्य भर सौपा गया ।
यह मालूम पड़ने के बाद ही बड़े भाई की आंखे खुली कि क्या षड्यंत्र चल रहा था । साथ ही बहनो का भी बड़ा हाथ था कि भाई को पैसे ना दिए जाये।
इस बीच माता पिता छोटा भाई बीमार हुए बड़े भाई और पत्नी ने दिन रात सेवा कर ये लोग जीवंत किये जिसके चलते एक बार 3 माह का पुत्र जो गर्भ में था वह खो दिया।
अन्य विप्पतिया आयी जिनमे बड़े बेटे ने हो आगे बढ़कर काम किया गांव की रंजिशें जिनमे बड़े भाई ने ही जान हथेली पर रख कर परिवार की जान बचाई । विद्यालय संचालन में भी अनेक बाधाएं होती है इन सबका सामना भी बड़े पुत्र ने ही किया।
अंत में बड़े पुत्र को आर्थिक तंगी सामाजिक दृष्टि से नीचा दिखाना उसका अस्तित्व उसका सपना खत्म कर्म पूरा षड्यंत्र किया गया।
अब ऐसे में क्या रास्ता बचता है ? या तो यह दुष्ट लोग जो इन तजार कर रहे है यह स्वयम खत्म हो जो कि पिछले 10 वर्षो से इनका स्वप्न चल रहा है। जीवन के 10 वर्ष एक दमदार सामाज सेवी । हमेशा सकारात्मक सोचने वाला। उसका जीवम ही इन लोगो ने खत्म कर दिया। यह इस छोटे भाई की अपना वर्चस्व स्थापित करने की चाहत या अपने भाई से जलन और द्वेष ।
हाँ जी सुनने में थोड़ा अटपटा परंतु परम सत्य , सीधे और सच्चे बने रहना जीवन को नरक बनाने के समान है पिछले कुछ दिनों आत्हत्या की घटनाये सामने आई है जिसमे बड़े भाई जो कि जिम्मेदारी समझ लगातार पूरे परिवार को साथ लेकर आगे बढ़ते रहे अपनी अधेड़ उम्र पर आ कर जिस परिवार के लिए उन्होंने अपना जीवन लगाया वही परिवार और उनके खास छोटे भाई द्वारा पूरे परिवार को गुमराह कर अपना वर्चस्व स्थापित करने मात्र की लालसा में बड़े भाई के प्रति भड़काने और नीचा दिखाने के लिए हर नीच हरकत पर उतर आए यहां तक बड़े भाइयो को इतना अपमानित और कमजोर कर दिया गया कि वे आत्महत्या पर विवश हो गए । 1 वर्ष पूर्व वृन्दावन मथुरा में राजू भारती जो प्रमुख उद्योग पति एवम नेता भी थे बेहद मिलन सार और सामाजिक व्यक्ति रहे उन्होंने छोटे भाई एवम परिवार से तंग आकर आत्महत्या करली । पूरा मथुरा जनपद एवम उन्हें जानने वाले इस घटना से स्तब्ध रह गए । उनके भाई के द्वारा उनका अपमान किया गया जो कि उनको आत्महत्या करने पर मजबूर करने की ओर इशारा करता है । तमाम मीडिया के साथियो ने आवाज उठानी चाही परंतु उन्हें न्याय नही मिल सका । आदमी के मरने के बाद कैसा न्याय जब व्यक्ति जिंदा होता है तब तो न्याय मिल नही पाता मरणोपरांत को न न्याय देगा ?
इसी प्रकार की घटना पानीपत में हाल ही में सामने आई है जहां छोटे भाई ने अपनी चतुराई से माता को अपने पक्ष में कर बड़े भाई को घर से निकलवाया और उसे जायदाद से बेदखल करने की साजिश रची यह षड्यंत्र वर्षो से चलता रहा अंत मे बड़ा भाई हार गया और उसने अपने 5 वर्षीय पुत्र 9 वर्षीय पुत्री एवम अपनी पत्नी को लायसेंसी रिवाल्वर से गोली मार दी इसके बाद स्वयम को गोली मारकर जीवन लीला समाप्त कर ली । पत्नी के घर वालो ने इस पूरी घटना पर से पर्दा हटाया । परंतु न्याय मिलना मुश्किल नजर आ रहा है ।
इस प्रकार के प्रकरणों को देख कर लगता है इन हत्याओं के दोषी वे माता पिता होते है जो स्वयम निर्णय नही ले पाते चमचागिरी और चाटुकारिता घर मे भी हावी हो जाती है । जो बेटा कुछ कार्य और सेवा ना कर झूठा दिखावा करता है सिर्फ और सिर्फ खुद को स्थापित करने के उद्देश्य से बड़े बेटे का वैभव यश कीर्ति से जलन के कारण उसे नीचा गिराने उसे कमजोर करने की पुरजोर कोशिश करता है माता पिता उसकी कठपुतली बन जाते है । इसमें बहुत बड़ा रोल घर की बेटियों का होता है जो छोटे भाई को अपना प्यारा भाई समझ कर बड़े भाई ले सारे कार्यो को भूल उसे स्थापित करने में लग जाती है ।
इन हत्याओं के पीछे बड़े भाइयो को नीचा दिखाने कमजोर करने में सहयोग करने वाले रिस्तेदार सगे संबंधी सभी जिम्मेदार होते है। ऐसे लोगो के विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज कर कार्यवाही होनी चाहिए।
ये लोग मानवता के नाम पर धब्बा होते है क्योंकि यह लोग परिवार के परिवार को नष्ट करने में उनके हस्ती खेलती जिंदगी को नरक बनाने में बेहद खुशी महसूस करते है अपनी जिंदगी खुशहाली से जीते है । दूसरे कमजोर पड़ रहे घर के सदस्य को नीचा दिखाने एवम उसे और ज्यादाकामजोर करने में आत्म संतुष्टि प्राप्त करते है यही उनका स्वप्न होता है। यह लोग ऐसा व्यवहार करते है जैसे कोई प्रतिशोध ले रहे हो।
जब कि सत्यता यह होती है यह वे लोग होते है जो किसी के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ नही बोल पाते कभी किसीकी मदद नही कर सकते । अपनी ही मदद नही कर सकते। डरपोक होते है । अपने आपको बेहद चतुर कहते है और अपने नजदीकी को सामने मीठा बोल उसकी पीठ में छुरा घोंपने की योजना बनाते है।
शायद आप लोगो यह बात अच्छी नही लग रही होंगी परंतु यह सत्य है अकाट्य सत्य । सामने शराफत का मुखोटा पहने यह लोग नाग नागिन से कम नही होते जो भूख लगने पर अपने ही बच्चों को खा जाते है।
जी हाँ ऐसी ही कहानी एक समाजसेवी महत्वाकांशी युवा की है जिसने एक गरीब परिवार में जन्म लिया। पढ़े लिखे माता पिता परंतु गरीब किसान । पिता के भाई पढ़ लिख कर सरकारी सेवाओं में संलग्न हो अच्छा जीवन यापन करने लगे ।
इस परिवार का बड़ा पुत्र जिसका जन्म 1981 में हुआ 5 वर्ष की आयु में अपने बड़े ताऊ के पास पड़ने भेजा गया । वहां जाकर जैसे रहा वैसे रहा बचपन में ही वापस आया कक्षा 6 से ही कुछ समझदारी आने पर अपने गरीब माता पिता को गरीबी से चटकारा दिला अपनी बहनों कोअच्छी शिक्षा अच्छी शादी कर अच्छे परिवार में भेजने के लिए सोचने लगा । कक्षा 12 तक पहुंचते पहुंचते खेती बाड़ी ट्रेक्टर चलना काम करके अपने पिता का सहयोग करने में लग गया । वर्ष 1999 में स्नातक में आते आते देश समाज के संबंध में सोचते हुए उसने अपने गांव के विकास की योजना बनाई बड़े ताऊजी से सहयोग लेकर संघर्ष कर पैदल घूम घूम कर एक संस्था बनाई। वर्ष 2000 में गांव के विकास के लिए कक्षा 1 से 5 एवम 9से 10 तक विद्यालयो की स्थापना की बेहद तल्लीनता के साथ शिक्षा प्रदान की , अपनी शिक्षा के साथ साथ ही संस्था के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । स्नातक करने के पश्चात परास्नातक किया जिसके करते ही देश मे व्याप्त अन्याय अत्याचार भर्ष्टाचार के विरुद्ध अभियान शुरू किया युवाओ को जागरूक भी करने लगा। जAगरुक युवा संगठन भारत की स्थापना की। युवाओ से नाशे से दूर रहने का आह्वाहन एवम खाली समय का उपयोग अच्छे कार्यो में करने का संदेश देने लगा । सामाजिक कार्यो के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों में भी संगन रहा उसके 3 बहने जो कि छोटी थी भाई 11 साल छोटा जिन्हें वह सारी सुविधाएं मुहैया कराने में लगा रहा । विद्यालय भी गांव के अनेक छात्रों का भविष्य निर्माता बना। वर्ष 2006 में विद्यालय को कक्षा 11 12 के संचालन की अनुमति मिली । साथ ही दिन रात की मेहनत से माता पिता की गरीबी भी चली गयी उल्टा वह समृद्ध हुए । बड़े बेटे के हर निर्णय मे साथ भी रहे ।अब भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी लड़ाई लड़नी थी उसने अब वर्तमान व्यवस्था पर सवाल उठाने शुरू किए । लोगो को न्याय दिलाने शुरू किया जिससे उसकी ख्याति बढ़ने लगी । परंतु यह क्या ज्यो ज्यो छोटा बेटा बड़ा हुआ । माता पिता और बड़े बेटे के बीच खाई पैदा होना शुरू हो गया । बड़ा भाई जुटा रहा इन सब चीजों से अन्विज्ञ बेखबर बहनो की शादियां धूमधाम से की,
जिसकी कल्पना माता पिता ने सपनो में भी ना की हो ऐसी शादियां हुई । शिक्षा के लिए छोटे भाई को कही बाहर नही भटकना पड़ा कम्प्यूटर से लेकर खेलने के हर सामान सब भाई को उपलब्ध कराए । 12 वी के उपरांत ही छोटे भाई को सिविल सर्विस की परीक्षा पास करने के लिए प्रेरित किया ।परंतु मूर्ख को क्या पता था कि यही भाई उसके लिए सबसे बड़ा दुश्मन बनकर उभरने वाला है ।
यही छोटा भाई और बहने लगातार एक षड्यंत्र रचती रही पीठ पीछे भाई के बाद रहे सामाजिक दायरे से जलन । प्रसिद्धि से जलन और द्वेष एवम छोटे भाई को स्थापित करने की योजना बनाने लगी । माता पिता के अंदर बड़े भाई के प्रति नफरत भरनेका कार्य लगातार जारी रहा ।
2008 में बड़े भाई की शादी हुई । जिसके बाद घर मे और अधिक विवाद गहराने लगे ।
वर्ष 2009 बड़े भाई को घर से रहने पर विवश कर दिया गया ।
2009 में बड़े भाई को माता पिता से नफरत भारी उल्टी सीधी बाते कहलवाया गया । वह घर से जाने पर विवश हो गया वह भी खाली हाथ । घर से कोई सहयोग नही मिहला । 2009 में सहयोग धर्मार्थ चिकित्सालय की स्थापना की। मोतियाबिंद के निशुल्क ऑपरेशन कराये। एक सरकारी प्रोजेक्ट के तहत कार्य किया ।
2 वर्ष बाद माता पिता द्वारा पुनः इमोशनल ड्रामा कर पुनः वापस बुलाया गया।
वर्ष 2011 में विद्यालय की स्थिति नाजुक थी जिसे सम्भालने के लिए विद्यालय को आधुनिकीकरण किया । फर्नीचर , विद्युतीकरण , सीसीटीवी कैमरे , झूले आदि से विद्यालय सुसज्जित किया। इस सबके लिए धन का कोई सहयोग माता पिता के द्वारा नही मिला । बड़े बेटे ने स्वयम इसकी व्यवस्था कर यहसारे कार्य कराए । गांव गांव संपर्क किया । जिससे अच्छे परिणाम मिले। साथ ही डिस्टेंस एजुकेशन के डिग्री डिप्लोमा कोर्सेज भी शुरू कराये गए ।
जैसे ही परिणाम मिलना शुरू हुए पिता जी विद्यालय के कॅश काउंटर पर आसीन हो गए । पिता के से एक दो बार आग्रह करने पर कि विद्यालय में बहुत पैसे लगे है हमे सुचारू रूप से संचालन करने दीजिए । पिता नही माने । बड़ा पुत्र पुनः वापस नाराज़ हो चला गया। अपने धर्मार्थ चिकित्सालय एवम संस्थाओ को संचालित करने लगा।
अब किसीने कभी उसकी कुशल क्षेम नही पूछी एवम किसी परेशानी में साथ नही आये । कोई खबर नही ली
3 वर्ष बाद जब विद्यालय पूण खत्म होने के कगार पर आया तब पुनः फिर से विद्यालय की जिम्मेदारी दे दी गयी।
वर्ष2014 इस बार माता जी को आगे किया गया आने वाली फीस के लिए माता जी जाती और ले आती ।
इस सब के बीच यह महत्व पूर्ण है कि खेती का सम्पूर्ण पैसा अन्य साधनों से होने वाली आय सदैव माता पिता के ही हाथ मे रही एक एक पैसे का हिसाब रहा और सदैव बड़े बेटे पर अनर्गल आरोप इनलोगो द्वारा लगाए जाते रहे।
इनलोगो से षड्यंत्र के तहत पुनः बेटे को विद्यालय छोड़ने पर मजबूर कर दिया । वर्ष भर लगाई गयी लागत भी बेकार गयी जो कि अपनी जेब से लगानी होती है। सत्र के अंत मे गरीब छात्रों द्वारा दी जाती है जिसे पुनः माता पिता द्वारा रख लिया गया। अभी तक भी बड़ा बेटा परिवार को परिवार ही समझता रहा और चल रहे गहरे षड्यंत्र को समझ नही पाया । इसके बाद भी कभी कोई सहायता नही की गई ।
वर्ष 2017 जब विद्यालय पुनः खत्म होने की कगार पर आ गया छात्र संख्या नगण्य रह गयी भवन खाली रह गया भवन को देख बेहद दुख हुआ आर्थिक स्थिति से टूटा हुआ बड़ा पुत्र वहां सरकारी योजनाए लेकर आया पुनः उसमे प्राण फूंकने के प्रयास किये प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अंतर्गत प्रशिक्षण प्रारम्भ किया गया । जो कि सफल रहा ।
विद्यालय संचालन का उद्देश्य छोड़कर सिर्फ सामाजिक संस्थाओं के संचालन का मन बना चुके बेटे को पुनः इमोशनली मूर्ख बनाने पिता ने फिर चाल चली। प्यार से कहा कि विद्यालय संचालन करो। बार बार कहने पर बेटे का स्वप्न्न विद्यालय महाविद्यालय संचालन के क्षेत्र में बालक बालिकाओ का उत्थान था ही उसे द्रवित कर दिया और पिता द्वारा 5 लाख की सहायता की शर्त पर पुनः विद्यालय संचालन के प्रयास तेज कर दिए।
विद्यालय को पुनः जीवन्त करने के लिए स्वयम व उसकी पत्नी एवम नया स्टाफ दिन रात कड़कती धूप में संपर्क में रहे और विद्यालय जीवंत कर दिया ।
विद्यालय जीवन्त होते ही धन की आवश्यकता पड़ने पर पुनः हाथ खड़े कर दिए गए क्योंकि इस बीच छोटे बेटे ने जिसे की आईपीएस की पढ़ाई हेतु बड़े भाई ने ही दिल्ली भेजा हुआ था डेरे गांव में डाले हुए थे । सिर्फ इस बात के लिए की भाई को पैसा ना दिया जाए।
बड़ा भाई अब भी नासमझ था क्योंकि वो अब भी अपना परिवार ही समझता था ।
इसके बाद पुनः बड़े भाई को घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा ।
गांव छोड़ते ही छोटे बेटे को बुला विद्यालय का कार्य भर सौपा गया ।
यह मालूम पड़ने के बाद ही बड़े भाई की आंखे खुली कि क्या षड्यंत्र चल रहा था । साथ ही बहनो का भी बड़ा हाथ था कि भाई को पैसे ना दिए जाये।
इस बीच माता पिता छोटा भाई बीमार हुए बड़े भाई और पत्नी ने दिन रात सेवा कर ये लोग जीवंत किये जिसके चलते एक बार 3 माह का पुत्र जो गर्भ में था वह खो दिया।
अन्य विप्पतिया आयी जिनमे बड़े बेटे ने हो आगे बढ़कर काम किया गांव की रंजिशें जिनमे बड़े भाई ने ही जान हथेली पर रख कर परिवार की जान बचाई । विद्यालय संचालन में भी अनेक बाधाएं होती है इन सबका सामना भी बड़े पुत्र ने ही किया।
अंत में बड़े पुत्र को आर्थिक तंगी सामाजिक दृष्टि से नीचा दिखाना उसका अस्तित्व उसका सपना खत्म कर्म पूरा षड्यंत्र किया गया।
अब ऐसे में क्या रास्ता बचता है ? या तो यह दुष्ट लोग जो इन तजार कर रहे है यह स्वयम खत्म हो जो कि पिछले 10 वर्षो से इनका स्वप्न चल रहा है। जीवन के 10 वर्ष एक दमदार सामाज सेवी । हमेशा सकारात्मक सोचने वाला। उसका जीवम ही इन लोगो ने खत्म कर दिया। यह इस छोटे भाई की अपना वर्चस्व स्थापित करने की चाहत या अपने भाई से जलन और द्वेष ।
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